एसआईआर पर संयुक्त राष्ट्र रिपोर्ट – भारत में अल्पसंख्यक वोटर मतदाता सूची से बाहर किए जा रहे

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में एसआईआर से जुड़े कई मुद्दों की ओर इशारा किया गया है, जिसमें ऐसे अस्पष्ट एआई -आधारित सिस्टम का कथित इस्तेमाल शामिल है, जिनमें सुधार का कोई उपाय नहीं है और जिनका मकसद अल्पसंख्यकों को बाहर रखना है।

‘द हिंदू’ की एक विशेष रिपोर्ट के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र के तीन विशेष दूतों ने भारत के चुनाव आयोग (ईसीआ) द्वारा चलाए जा रहे ‘विशेष गहन संशोधन’ (एसआईआर) कार्यक्रम को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है। संयुक्त राष्ट्र के इन विशेषज्ञों ने आरोप लगाया है कि इस प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर मुस्लिम और अन्य अल्पसंख्यक मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं।

संयुक्त राष्ट्र के दूतों ने भारत सरकार का ध्यान इस ओर आकर्षित करते हुए कहा है कि चुनाव आयोग के नेतृत्व में चल रही इस एसआईआर प्रक्रिया के माध्यम से मतदाता सूचियों से लाखों नाम बड़े पैमाने पर हटाए गए हैं। इस कदम से विशेष रूप से अल्पसंख्यक समूहों के लोग प्रभावित हो रहे हैं।

पारदर्शिता की कमी और एआई का इस्तेमाल: संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में इस बात पर विशेष रूप से चिंता जताई गई है कि मतदाता सूची में संशोधन के लिए अपारदर्शी और एआई-संचालित सिस्टम का इस्तेमाल किया जा रहा है। इन तकनीकों में सुधार या शिकायत निवारण का कोई स्पष्ट जरिया मौजूद नहीं है। रिपोर्ट में यह भी आशंका व्यक्त की गई है कि इसके पीछे अल्पसंख्यकों को बाहर करने का एक राजनीतिक नैरेटिव (राजनीतिक एजेंडा) हो सकता है।

यह रिपोर्ट 1 मई 2026 को तैयार की गई थी, जिसमें भारत सरकार को इन चिंताओं पर अपना पक्ष रखने और जवाब देने के लिए 60 दिनों की समय-सीमा दी गई थी।

यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब भारत के विभिन्न राज्यों में चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूचियों को दुरुस्त करने के लिए घर-घर जाकर सत्यापन और गहन संशोधन किया जा रहा है। पश्चिम बंगाल, कर्नाटक और मिजोरम जैसे कई राज्यों से बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जाने की खबरें सामने आई हैं, जिस पर अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी नजर रखी जा रही है। इस रिपोर्ट के लिखे जाने तक भारत सरकार की प्रतिक्रिया नहीं आई थी।

विशेषज्ञों ने भारत सरकार से आग्रह किया कि वह इन आरोपों की जांच करे, विस्तृत जवाब दे और राजनीतिक भागीदारी, भेदभाव न करने और अल्पसंख्यकों के अधिकारों से जुड़े अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों का पालन सुनिश्चित करे। बहरहाल, कानूनी चुनौतियों और आलोचकों के विरोध के बावजूद, एसआईआर प्रक्रिया अपने तीसरे चरण में प्रवेश कर चुकी है।

रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम निर्वाचन क्षेत्र का ज़िक्र किया गया है, जहाँ हटाए गए मतदाताओं में से 95 प्रतिशत मुस्लिम थे, जबकि उस क्षेत्र के कुल मतदाताओं में मुसलमानों की हिस्सेदारी सिर्फ़ 25 प्रतिशत के आसपास है। प्रभावित लोगों में कथित तौर पर ऐसे भारतीय पुरुष, महिलाएँ और बुज़ुर्ग शामिल थे जिनके पास वैध पहचान दस्तावेज़ थे।

इसमें यह भी कहा गया है कि लिस्ट से बाहर किए गए कई लोगों ने राहत पाने के लिए चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 6 अप्रैल 2026 को प्रक्रिया पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। इस पत्र में उन आरोपों का भी ज़िक्र है कि सरकारी दस्तावेज़ों में स्पेलिंग की मामूली गलतियों जिन्हें भारत में आम प्रशासनिक समस्या माना जाता है को वोटर के नाम हटाने का आधार बनाया गया।

पश्चिम बंगाल चुनावों में लगभग 27 लाख लोगों को वोटिंग से बाहर कर दिया गया; इन्हें “लॉजिकल विसंगतियों” की व्यापक श्रेणी में रखा गया था। विशेषज्ञों ने बिहार में पहले हुई ऐसी ही प्रक्रिया से जुड़ी चिंताओं का भी ज़िक्र किया, जिससे कथित तौर पर मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के बड़े पैमाने पर मताधिकार छिनने और नागरिकता खत्म होने का डर पैदा हुआ था।

इस रिपोर्ट में एक और चिंता एआई आधारित सिस्टम के कथित इस्तेमाल को लेकर जताई गई, जिसने वोटर डेटा में “अनियमितताओं” की पहचान की थी।

विशेषज्ञों का कहना है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के कथित इस्तेमाल से पारदर्शिता, संभावित गलतियों और एल्गोरिदम के पक्षपाती होने को लेकर सवाल खड़े हुए हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि इतनी अहम प्रशासनिक प्रक्रिया में एआई का इस्तेमाल करने से असली वोटरों का मताधिकार छिनने और लोकतांत्रिक निष्पक्षता के कमज़ोर होने का खतरा है।

रिपोर्ट में सरकार के कई मंत्रियों और अन्य नेताओं द्वारा एसआईआर प्रक्रिया के दौरान दिए गए बयानों पर भी चिंता जताई गई है। पत्र के अनुसार, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह सहित सरकारी अधिकारियों ने सार्वजनिक रूप से मतदाता नामों को हटाने को “अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों” को निशाना बनाने के रूप में पेश किया। यूएन विशेषज्ञों ने इसे भारतीय मुस्लिम नागरिकों को विदेशी नागरिकों के साथ भ्रमित करने वाला बयान बताया।

इसमें चुनावी प्रक्रियाओं के संबंध में “पता लगाओ, हटाओ और निर्वासित करो” की नीति के बार-बार उल्लेख का भी जिक्र किया गया है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि इस तरह की बयानबाजी धार्मिक या राष्ट्रीय घृणा को बढ़ावा देने के समान हो सकती है, जो नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय संधि (आईसीसीपीआर) के अनुच्छेद 20(2) के तहत प्रतिबंधित है। उन्होंने आगे चेतावनी दी कि किसी धार्मिक समुदाय को हटाने के संदर्भ में राज्य द्वारा संचालित चुनावी प्रक्रिया को प्रस्तुत करना मुस्लिम नागरिकों के प्रति भेदभावपूर्ण रवैये को वैधता प्रदान करने का जोखिम पैदा करता है और नस्लीय भेदभाव के सभी रूपों के उन्मूलन पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन (आईसीईआरडी) के तहत भारत के दायित्वों का उल्लंघन कर सकता है।

यूएन के विशेष दूतों ने भारत सरकार से सात मुद्दों पर विस्तृत जानकारी मांगी। इनमें यह सुनिश्चित करने के लिए उठाए गए कदम शामिल थे कि एसआईआर प्रक्रिया अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों का पालन करे।

विशेषज्ञों ने उन लोगों की जाति और धर्म के बारे में अलग-अलग डेटा भी मांगा, जिन्हें वोटर लिस्ट से हटा दिया गया था या अयोग्य घोषित कर दिया गया था। अगर ऐसा डेटा उपलब्ध नहीं था, तो उन्होंने इसके लिए स्पष्टीकरण भी मांगा।

संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत भारत की जिम्मेदारियों का ज़िक्र किया, जिसमें आईसीसीपीआर और राष्ट्रीय या जातीय, धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर 1992 का संयुक्त राष्ट्र घोषणापत्र शामिल है।

उन्होंने याद दिलाया कि आईसीसीपीआर का अनुच्छेद 25 हर नागरिक को बिना किसी अनुचित प्रतिबंध के वोट देने और सार्वजनिक मामलों में भाग लेने का अधिकार देता है, जबकि अनुच्छेद 27 जातीय, धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करता है।

विशेषज्ञों ने कहा कि वोटर रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया निष्पक्ष, उचित और भेदभाव-रहित होनी चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि एसआईआर प्रक्रिया के कारण बताई गई प्रक्रियात्मक मुश्किलें मुस्लिम नागरिकों पर बहुत ज़्यादा असर डालती दिख रही हैं।

उन्होंने आगे चेतावनी दी कि कम समय सीमा, एआई कार्यप्रणाली के बारे में बताई गई अस्पष्टता, और आर्थिक व भाषाई रूप से पिछड़े समुदायों को अपनी बेदखली को चुनौती देने में आने वाली बाधाएं, अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून के तहत वोट देने के अधिकार पर अनुचित प्रतिबंध के बराबर हो सकती हैं।

इस सूचना में कहा गया है कि इसे, और भारत सरकार से मिलने वाले किसी भी जवाब को, 60 दिनों के बाद सार्वजनिक किया जाएगा और इसे संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की समय-समय पर होने वाली रिपोर्टिंग प्रक्रिया में भी शामिल किया जा सकता है।

इस बीच, विशेषज्ञों ने सरकार से आग्रह किया कि अगर आरोप सही साबित होते हैं, तो वे किसी भी चल रहे उल्लंघन को रोकने, उन्हें दोबारा होने से बचाने और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए अंतरिम उपाय करें।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और क़ानूनी मामलों के जानकार हैं।)

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